Saturday, 3 June 2017

बच्चे प्रदर्शन की वस्तु नही हैं

अभी हाल ही में अपने दिल्ली प्रवास के दौरान अपने एक पुराने मित्र के घर जाने का अवसर प्राप्त हुआ । तमाम औपचारिकताओं के दौरान उन्होनें अपने ढाई साल के बच्चे का परिचय कराया । परिचय और साधारण सी होने वाली बातचीत जल्द ही बच्चे के विविध सूचना रूपी सीख एवं कला के प्रस्तुति और प्रदर्शन में तब्दिल हो गया । बच्चे के सही प्रतिक्रिया पर अभिभावक द्वारा प्रसंशा एवं खुशी का इजहार एवं गलत प्रतिक्रिया पर उसे सुधारने का उतावलापन । अनौपचारिक मूल्यांकन का यह दौर तबतक चलता रहा जब तक बच्चा ऊब न गया । अत्यंत असहज करने वाली यह घटना मेरे लिए  कोई नई नही थी । अक्सर अभिभावक अपने बच्चों के गुणों के प्रदर्शन में गौरवान्वित होते हैं और हो भी क्यों नहीं क्योंकि बालक का बेहतर प्रदर्शन न केवल उनके कुशल अभिभावकत्व के भ्रम को पोषित करता है अपितु एक विशिष्ट बालक का अभिभावक होने का भाव देकर छद्म सामाजिक प्रसंशा का कारण बनता है । मैनें यहां छ्द्म सामाजिक प्रसंशा शब्द का प्रयोग जानबुझकर किया है क्योंकि ज्यादातर आगंतुक बालकों के प्रदर्शन की प्रसंशा आनन्दित होकर नही वरन अभिभावक के उत्साह से असहमति नही रख पाने के भाव से उत्पन्न संकोच में करते हैं । यहाँ यह बात उल्लेखनीय है कि भावों की निर्मलता के कारण बाल- स्वभाव स्वतः लोगों कों आकर्षित करता है । जबरन ठूँसी गयी सूचनाऐं बच्चों के संज्ञानात्मक विकास की नैसर्गिक प्रक्रिया को दोषपूर्ण करते हैं । संज्ञान से तात्पर्य सूचना के ग्रहण से लेकर उसको जानने या उसको मैं जानता हूँ इस एहसास तक की मानसिक प्रक्रिया है । ज्यादातर अभिभावक अधिक से अधिक सूचनाओं की आवृति रूपी अभ्यास द्वारा स्मृतीकरण को भूलवश सीखना समझ लेते हैं । सूचना शब्द प्रधान होता है । अनुभवहीन शब्दबाहुल्यता संज्ञानात्मक विकास में संकुचित दृढता को उत्पन्न करता है जो एक प्रकार की कंडिशनिंग (अनुबंधन) है । सीखने के नैसर्गिक विकास के लिए इस प्रकार का अनुबन्धन उपयुक्त नही है । सूचना रूपी सीख का प्रदर्शन, प्रदर्शन के लिए सीखने में जल्द ही परिणत हो जाता है । अब बच्चा अपनी हर सीख को दिखाने, बताने का प्रयास करने लगता है । पहले तो अभिभावक एवं आगंतुक अत्यंत उत्साह के साथ प्रतिक्रिया देते हैं किन्तु धीरे धीरे उनका उत्साह कम होने लगता है । प्रोत्साहन द्वारा सिखाने में अभिभावकों द्वारा संतुलित प्रतिक्रिया नही दे पाना एक आम बात है जो धीरे-धीरे बालक के सीखने के उत्साह को कम कर सीखने की प्रगति को शिथिल करता है । एक और महत्वपूर्ण तथ्य जो अनावश्यक सूचना और सीखने के प्रदर्शन से उत्पन्न होता है वो है बालकों की जिज्ञासा और धैर्य में कमी । अभिभावक का पूर्व में अधिकाधिक सूचना देना बालक के नैसर्गिक जिज्ञासा की प्रवृति और उसके उत्तर को स्वयं से खोजने की क्षमता को कमजोर करता है । सूचना की बहुलता और प्रदर्शन की प्रवृति के कारण बालक प्रश्न पर प्रश्न पूछता है जिसे हम बच्चे की बढती जिज्ञासा के रूप में देखते हैं । चूँकि ये प्रश्न बालक के अनावश्यक प्राप्त सूचनाओं के कारण उत्पन्न होते हैं अतः इन प्रश्नों का बालक के लिए कोई विशेष अर्थ नही होता किन्तु अभिभावक का उत्तर न देना या गलत उत्तर देना जो बहुत सामान्य सी घटना है, बालक के संज्ञानात्मक विकास को दूषित करने के लिए पर्याप्त होता है।
प्रारम्भिक बाल्यावस्था संज्ञानात्मक विकास का आधारभूत काल है अतः अभिभावकों का व्यवहार अत्यंत सावधानीपूर्वक होना चाहिए । बच्चों को अधिकाधिक सूचना देने से बचना चाहिए । ध्यान रहे आपका अनावश्यक बताना ही बच्चों के अनावश्यक प्रश्न के कारण हैं अतः उन्हें बताने से ज्यादा स्वयं से अनुभव द्वारा सीखने दें । यह समय संज्ञानात्मक प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले ज्ञानेन्द्रियों के विकास एवं परिपक्वता का है अतः उनके नैसर्गिक विकास को कम से कम हस्तक्षेप कर बस होने दें । अभिभावक ज्ञानेन्द्रियों के प्रभावशीलता को बढाने के लिए बच्चों के परिवेश की नैसर्गिकता, विविधता और समग्रता पर काम कर सकते हैं।

प्रभाकर पाण्डेय
सहायक प्राध्यापक
वैकल्पिक शिक्षा विभाग
साँची बौद्ध-भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय

Thursday, 19 May 2016

Admition information about Sanchi University

साँची बौद्ध-भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय सत्र 2016-17 के लिए विविध पाठ्यक्रमों में प्रवेश हेतु इक्छुक छात्रों से ऑनलाइन आवेदन आमंत्रित करता है।आवेदन करने की अंतिम तारीख़ 6 जून है।इस सत्र में विश्वविद्यालय दर्शन, भाषा, योग, आयुर्वेद के विविध पाठ्यक्रमों में M.A., M.Phil., Ph.D. कार्यक्रमों का संचालन कर रहा है।विदित हो की साँची विश्वविद्यालय दर्शन की एक मात्र विश्वविद्यालय है जिसके कोर में भारतीय दर्शन है।अपने इन्हीं विशेषताओं के कारण यह विश्वविद्यालय एक अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय बनने के पथ पर अग्रसर है।शोध एवं शिक्षण को बढ़ावा देने के लिए विश्वविद्यालय ने सभी शोध छात्रों को 14000/- प्रतिमाह एवं सभी M.Phil. छात्रों को 8000/- प्रतिमाह छात्रवृत्ति देने का फैसला किया है।M.A. पाठ्यक्रमों में वरीयता आधारित छात्रवृत्ति सभी विभाग के छात्रों के लिए है।विशेष जानकारी के लिए विश्वविद्यालय की वेबसाइट देखें-www.sanchiuniv.org.in

Friday, 6 May 2016


...…बातचीत के क्रम में मुझे एल्लेशरीन जी से ज्ञात हुआ कि उनकी बड़ी बेटी इस समय कॉलेज में है।इस पर मैंने पूछा कि बगैर स्कूल गये कॉलेज में उसका एडमिशन कैसे हुआ? इस पर उन्होनें बताया कि CBSE और ICSE के समानांतर दो ऐसे बोर्ड हैं जो होम स्कूलिंग या ऑल्टरनेटिव स्कूल से पढ़ने वाले बच्चों के दसवीं एवं बारहवीं के बोर्ड की परीक्षा कराता है।वो है-National Institute of Open Schooling (NIOS; राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान), formerly National Open School और International General Certificate of Secondary Education (IGCSE) । NIOS सबको शिक्षा देने के भारत सरकार के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए स्थापित संस्था है।यह बोर्ड हिन्दी और इंग्लिश दोनों माध्यम से परीक्षा कराती है।IGCSE अंतराष्ट्रीय संस्था है यह केवल इंग्लिश माध्यम से परीक्षा लेती है। उन्होनें बताया कि प्रारंभ में इस प्रयोग को लेकर डर लगा था लेकिन अब जब मेरा छोटा बेटा 8 साल का है मैं पूरी तरह से निश्चिंत हूँ। और ये निश्चिंतता इसलिए भी है क्योंकि मुझे पता है कि मेरे बच्चे Unconditional Love वाले वातावरण में सीख रहे हैं।मैं अपने बच्चों को सीखने के लिए कभी नही कहता बस हम बच्चों के तीन ‘A’ Attention Alertness और Awareness पर काम करते हैं।बाकी सबकुछ सहज तरीके से हो जाता है। क्रमशः आगे…..


प्रभाकर पाण्डेय
सहायक प्राध्यापक
वैकल्पिक शिक्षा केंद्र (साँची विश्वविद्यालय)

Thursday, 5 May 2016


अभी हाल ही में मुझे सेवाग्राम (वर्धा) में नई तालीम समिति के तत्वावधान में आयोजित शिक्षा विषयक सम्मेलन में भाग लेने का अवसर प्राप्त हुआ।ये वही जगह है जहाँ से गाँधी जी ने बुनियादी शिक्षा की बात कही और शिक्षा का उद्देश्य 3H अर्थात Head, Heart and Hand का विकास बताया।नई शिक्षा नीति के लिए सुझाव से संबंधित मसौदा बनाने के क्रम में मेरी मुलाकात केरल से आए श्री अरुण एलेस्सरीन जी से हुई जिन्होंने शिक्षा से सम्बन्धित प्रयोग अपने ऊपर ही किया। उनकी 1बेटी और 2बेटे हैं जो स्कूल नही जाते या यूँ कहे वे उन्हें घर पर ही पढ़ने और सीखने का माहौल उपलब्ध कराते हैं।उनके अनुभव में हमारी शिक्षा व्यवस्था में जो 16 साल की स्कूलिंग है वो समय का दुरुपयोग है वे मानते थे कि इन 16 सालों में जो बच्चे सीखते हैं वो मुश्किल से 8 वर्ष लायक भी नही है, साथ ही इस दौरान बहुत सारी ऐसी बातें सिखाई जाती हैं जिनका हम पुरे जीवन काल में कभी उपयोग नही करते।ऐसे में ये समय और श्रम का बहुत बड़ा दुरपयोग है।इस वार्तालाप ने मेरे मन में कई प्रश्न उत्पन्न किए जो मैं अपने अगले पोस्ट में शेयर करूँगा।

प्रभाकर पाण्डेय
सहायक प्राध्यापक
वैकल्पिक शिक्षा केंद्र (साँची विश्वविद्यालय)

पिछले 10 सालो में सीखने के स्वरूप में काफी परिवर्तन हुआ है।मनोविज्ञान के क्षेत्र में हुए शोधकार्यों ने शिक्षा को गतिविधि आधारित बना दिया है।आज गतिविधि आधारित सीखना जैसे-प्रोजेक्ट विधि, खेल विधि, प्रदर्शन विधि का सीखने के क्षेत्र में बहुत ज्यादा प्रयोग हो रहा है।प्रोजेक्ट ने पूरी शिक्षा व्यवस्था को ऐसे हाइजेक कर रखा है जैसे बिना प्रोजेक्ट और एक्टीविटी के कुछ सीखा ही नही जा सकता है। एक्टिविटीज़ के इस अंधी दौड़ ने केवल अभिभावकों का जेब ढीला किया है।पालकों को इस बात को समझना होगा कि एक्टिविटी करने की नही चीज है बल्कि यह होने की चीज़ है।इस बुनियादी अंतर के न समझने से आज स्कूल्स एक्टीविटी के नाम पर कुछ भी करा रहे हैं बिना उसके प्रभाव को समझे।एक उदाहरण के माध्यम से समझाना चाहूँगा-आज कल पब्लिक स्कूल्स में पेपर कटिंग आर्ट का खूब प्रचलन है। बालक पूरे मनोयोग से पेपर काट कर विभिन्न प्रकार की आकृतियां बनाते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में कटे हुए पेपर का ढेर निकलता है।अब ध्यान से इस प्रक्रिया को देखेंगे तो पता चलेगा कि बाल मन क्या क्या सीख रहा है?उसने सीखा की काटने से सुन्दर आकृति बनती है।बालक के भावात्मक क्षेत्र में परस्पर दो विरोधी भावों का संघर्ष होता है।काटना(हिंसा) और सौंदर्य।यह विरोध बालक के भावात्मक विकास के लिए अत्यंत नुकसानदायक है।दूसरी बात कटिंग के दौरान निकले रद्दी कागज़ को जब वो फेकता है तो वो कचरे का प्रबंधन नही अपितु कचरे का निस्तारण सीखता है।प्रारंभ की ये सीख बच्चे के व्यक्तित्व के लिए बेहद नुकसानदायक है।

प्रभाकर पाण्डेय
सहायक प्राध्यापक
वैकल्पिक शिक्षा केंद्र, साँची विश्वविद्यालय
अपने नैनिहालों को अच्छे स्कूल में नामांकन करवाने के लिए इस समय अभिभावक एड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं।हालात ऐसे हैं कि यदि किसी कान्वेन्ट या नामी पब्लिक स्कूल में बच्चे का नामांकन नही हुआ तो अभिभावकों लगता है कि उनसे बड़ा बदनशीब कोई नही होगा आज स्कूल हमारा स्टेटस सिम्बल हो गया है। स्कूल व्यवसायी भी अभिभावकों के इस मनोदशा का भरपूर लाभ उठा रहे हैं और उनसे मनमाफिक पैसे ले कर पालकों को गुमराह करते हैं। इस सारभौमिक सत्य के साथ कि कोई किसी को कुछ सीखा नही सकता, पब्लिक स्कूलों के बड़े बड़े दावे समझ से परे हैं।यह बात अभिभावकों को समझना होगा कि बच्चों के सीखने में इन स्कूल्स का योगदान 10% से ज्यादा नही है जबकि इनके द्वारा बच्चे की प्रकृति में जो छेड़छाड़ होता है उससे होने वाला नुकसान इससे कई गुना ज्यादा है।अपने पोस्ट के माध्यम से मैं आपलोगों को सीखने के क्षेत्र में हो रहे नये शोध कार्यों को साझा करना चाहता हूँ जिससे आप सीखाने के नाम पर हो रहे गोरखधंधो को समझ सकें और स्कूलों द्वारा हो रही मनमानी से बच सकें।