Thursday, 5 May 2016


पिछले 10 सालो में सीखने के स्वरूप में काफी परिवर्तन हुआ है।मनोविज्ञान के क्षेत्र में हुए शोधकार्यों ने शिक्षा को गतिविधि आधारित बना दिया है।आज गतिविधि आधारित सीखना जैसे-प्रोजेक्ट विधि, खेल विधि, प्रदर्शन विधि का सीखने के क्षेत्र में बहुत ज्यादा प्रयोग हो रहा है।प्रोजेक्ट ने पूरी शिक्षा व्यवस्था को ऐसे हाइजेक कर रखा है जैसे बिना प्रोजेक्ट और एक्टीविटी के कुछ सीखा ही नही जा सकता है। एक्टिविटीज़ के इस अंधी दौड़ ने केवल अभिभावकों का जेब ढीला किया है।पालकों को इस बात को समझना होगा कि एक्टिविटी करने की नही चीज है बल्कि यह होने की चीज़ है।इस बुनियादी अंतर के न समझने से आज स्कूल्स एक्टीविटी के नाम पर कुछ भी करा रहे हैं बिना उसके प्रभाव को समझे।एक उदाहरण के माध्यम से समझाना चाहूँगा-आज कल पब्लिक स्कूल्स में पेपर कटिंग आर्ट का खूब प्रचलन है। बालक पूरे मनोयोग से पेपर काट कर विभिन्न प्रकार की आकृतियां बनाते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में कटे हुए पेपर का ढेर निकलता है।अब ध्यान से इस प्रक्रिया को देखेंगे तो पता चलेगा कि बाल मन क्या क्या सीख रहा है?उसने सीखा की काटने से सुन्दर आकृति बनती है।बालक के भावात्मक क्षेत्र में परस्पर दो विरोधी भावों का संघर्ष होता है।काटना(हिंसा) और सौंदर्य।यह विरोध बालक के भावात्मक विकास के लिए अत्यंत नुकसानदायक है।दूसरी बात कटिंग के दौरान निकले रद्दी कागज़ को जब वो फेकता है तो वो कचरे का प्रबंधन नही अपितु कचरे का निस्तारण सीखता है।प्रारंभ की ये सीख बच्चे के व्यक्तित्व के लिए बेहद नुकसानदायक है।

प्रभाकर पाण्डेय
सहायक प्राध्यापक
वैकल्पिक शिक्षा केंद्र, साँची विश्वविद्यालय

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