साँची बौद्ध-भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय सत्र 2016-17 के लिए विविध पाठ्यक्रमों में प्रवेश हेतु इक्छुक छात्रों से ऑनलाइन आवेदन आमंत्रित करता है।आवेदन करने की अंतिम तारीख़ 6 जून है।इस सत्र में विश्वविद्यालय दर्शन, भाषा, योग, आयुर्वेद के विविध पाठ्यक्रमों में M.A., M.Phil., Ph.D. कार्यक्रमों का संचालन कर रहा है।विदित हो की साँची विश्वविद्यालय दर्शन की एक मात्र विश्वविद्यालय है जिसके कोर में भारतीय दर्शन है।अपने इन्हीं विशेषताओं के कारण यह विश्वविद्यालय एक अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय बनने के पथ पर अग्रसर है।शोध एवं शिक्षण को बढ़ावा देने के लिए विश्वविद्यालय ने सभी शोध छात्रों को 14000/- प्रतिमाह एवं सभी M.Phil. छात्रों को 8000/- प्रतिमाह छात्रवृत्ति देने का फैसला किया है।M.A. पाठ्यक्रमों में वरीयता आधारित छात्रवृत्ति सभी विभाग के छात्रों के लिए है।विशेष जानकारी के लिए विश्वविद्यालय की वेबसाइट देखें-www.sanchiuniv.org.in
Thursday, 19 May 2016
Saturday, 7 May 2016
Friday, 6 May 2016
...…बातचीत के क्रम में मुझे एल्लेशरीन जी से ज्ञात हुआ कि उनकी बड़ी बेटी इस समय कॉलेज में है।इस पर मैंने पूछा कि बगैर स्कूल गये कॉलेज में उसका एडमिशन कैसे हुआ? इस पर उन्होनें बताया कि CBSE और ICSE के समानांतर दो ऐसे बोर्ड हैं जो होम स्कूलिंग या ऑल्टरनेटिव स्कूल से पढ़ने वाले बच्चों के दसवीं एवं बारहवीं के बोर्ड की परीक्षा कराता है।वो है-National Institute of Open Schooling (NIOS; राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान), formerly National Open School और International General Certificate of Secondary Education (IGCSE) । NIOS सबको शिक्षा देने के भारत सरकार के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए स्थापित संस्था है।यह बोर्ड हिन्दी और इंग्लिश दोनों माध्यम से परीक्षा कराती है।IGCSE अंतराष्ट्रीय संस्था है यह केवल इंग्लिश माध्यम से परीक्षा लेती है। उन्होनें बताया कि प्रारंभ में इस प्रयोग को लेकर डर लगा था लेकिन अब जब मेरा छोटा बेटा 8 साल का है मैं पूरी तरह से निश्चिंत हूँ। और ये निश्चिंतता इसलिए भी है क्योंकि मुझे पता है कि मेरे बच्चे Unconditional Love वाले वातावरण में सीख रहे हैं।मैं अपने बच्चों को सीखने के लिए कभी नही कहता बस हम बच्चों के तीन ‘A’ Attention Alertness और Awareness पर काम करते हैं।बाकी सबकुछ सहज तरीके से हो जाता है। क्रमशः आगे…..
प्रभाकर पाण्डेय
सहायक प्राध्यापक
वैकल्पिक शिक्षा केंद्र (साँची विश्वविद्यालय)
Thursday, 5 May 2016
अभी हाल ही में मुझे सेवाग्राम (वर्धा) में नई तालीम समिति के तत्वावधान में आयोजित शिक्षा विषयक सम्मेलन में भाग लेने का अवसर प्राप्त हुआ।ये वही जगह है जहाँ से गाँधी जी ने बुनियादी शिक्षा की बात कही और शिक्षा का उद्देश्य 3H अर्थात Head, Heart and Hand का विकास बताया।नई शिक्षा नीति के लिए सुझाव से संबंधित मसौदा बनाने के क्रम में मेरी मुलाकात केरल से आए श्री अरुण एलेस्सरीन जी से हुई जिन्होंने शिक्षा से सम्बन्धित प्रयोग अपने ऊपर ही किया। उनकी 1बेटी और 2बेटे हैं जो स्कूल नही जाते या यूँ कहे वे उन्हें घर पर ही पढ़ने और सीखने का माहौल उपलब्ध कराते हैं।उनके अनुभव में हमारी शिक्षा व्यवस्था में जो 16 साल की स्कूलिंग है वो समय का दुरुपयोग है वे मानते थे कि इन 16 सालों में जो बच्चे सीखते हैं वो मुश्किल से 8 वर्ष लायक भी नही है, साथ ही इस दौरान बहुत सारी ऐसी बातें सिखाई जाती हैं जिनका हम पुरे जीवन काल में कभी उपयोग नही करते।ऐसे में ये समय और श्रम का बहुत बड़ा दुरपयोग है।इस वार्तालाप ने मेरे मन में कई प्रश्न उत्पन्न किए जो मैं अपने अगले पोस्ट में शेयर करूँगा।
प्रभाकर पाण्डेय
सहायक प्राध्यापक
वैकल्पिक शिक्षा केंद्र (साँची विश्वविद्यालय)
पिछले 10 सालो में सीखने के स्वरूप में काफी परिवर्तन हुआ है।मनोविज्ञान के क्षेत्र में हुए शोधकार्यों ने शिक्षा को गतिविधि आधारित बना दिया है।आज गतिविधि आधारित सीखना जैसे-प्रोजेक्ट विधि, खेल विधि, प्रदर्शन विधि का सीखने के क्षेत्र में बहुत ज्यादा प्रयोग हो रहा है।प्रोजेक्ट ने पूरी शिक्षा व्यवस्था को ऐसे हाइजेक कर रखा है जैसे बिना प्रोजेक्ट और एक्टीविटी के कुछ सीखा ही नही जा सकता है। एक्टिविटीज़ के इस अंधी दौड़ ने केवल अभिभावकों का जेब ढीला किया है।पालकों को इस बात को समझना होगा कि एक्टिविटी करने की नही चीज है बल्कि यह होने की चीज़ है।इस बुनियादी अंतर के न समझने से आज स्कूल्स एक्टीविटी के नाम पर कुछ भी करा रहे हैं बिना उसके प्रभाव को समझे।एक उदाहरण के माध्यम से समझाना चाहूँगा-आज कल पब्लिक स्कूल्स में पेपर कटिंग आर्ट का खूब प्रचलन है। बालक पूरे मनोयोग से पेपर काट कर विभिन्न प्रकार की आकृतियां बनाते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में कटे हुए पेपर का ढेर निकलता है।अब ध्यान से इस प्रक्रिया को देखेंगे तो पता चलेगा कि बाल मन क्या क्या सीख रहा है?उसने सीखा की काटने से सुन्दर आकृति बनती है।बालक के भावात्मक क्षेत्र में परस्पर दो विरोधी भावों का संघर्ष होता है।काटना(हिंसा) और सौंदर्य।यह विरोध बालक के भावात्मक विकास के लिए अत्यंत नुकसानदायक है।दूसरी बात कटिंग के दौरान निकले रद्दी कागज़ को जब वो फेकता है तो वो कचरे का प्रबंधन नही अपितु कचरे का निस्तारण सीखता है।प्रारंभ की ये सीख बच्चे के व्यक्तित्व के लिए बेहद नुकसानदायक है।
प्रभाकर पाण्डेय
सहायक प्राध्यापक
वैकल्पिक शिक्षा केंद्र, साँची विश्वविद्यालय
अपने नैनिहालों को अच्छे स्कूल में नामांकन करवाने के लिए इस समय अभिभावक एड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं।हालात ऐसे हैं कि यदि किसी कान्वेन्ट या नामी पब्लिक स्कूल में बच्चे का नामांकन नही हुआ तो अभिभावकों लगता है कि उनसे बड़ा बदनशीब कोई नही होगा आज स्कूल हमारा स्टेटस सिम्बल हो गया है। स्कूल व्यवसायी भी अभिभावकों के इस मनोदशा का भरपूर लाभ उठा रहे हैं और उनसे मनमाफिक पैसे ले कर पालकों को गुमराह करते हैं। इस सारभौमिक सत्य के साथ कि कोई किसी को कुछ सीखा नही सकता, पब्लिक स्कूलों के बड़े बड़े दावे समझ से परे हैं।यह बात अभिभावकों को समझना होगा कि बच्चों के सीखने में इन स्कूल्स का योगदान 10% से ज्यादा नही है जबकि इनके द्वारा बच्चे की प्रकृति में जो छेड़छाड़ होता है उससे होने वाला नुकसान इससे कई गुना ज्यादा है।अपने पोस्ट के माध्यम से मैं आपलोगों को सीखने के क्षेत्र में हो रहे नये शोध कार्यों को साझा करना चाहता हूँ जिससे आप सीखाने के नाम पर हो रहे गोरखधंधो को समझ सकें और स्कूलों द्वारा हो रही मनमानी से बच सकें।
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